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प्रियतमा सखी राधा : एक विचारों की कड़ी

  • Writer: Jasdeep Kaur
    Jasdeep Kaur
  • May 20
  • 3 min read

Updated: Jul 13

Krishna trying to console Radha sitting on a seattee in the forest

सिनेमा घरों में आजकल एक नई मूवी आई है, कृष्णावतारं : हृदयम्, इंस्टाग्राम रील्स में उसका एक सीन देखा, जिसमें श्री कृष्ण माता रुक्मिणी को लेने आते हैं। श्री कृष्ण के पीछे नारायण की छवि होती है, तो माता रुक्मिणी के पीछे महालक्ष्मी की। किसी ने कमेंट किया था, "अगर माता रुक्मणी ही महालक्ष्मी है तो राधा रानी कौन है?" और किसी ने उसका जवाब दिया "मनगढ़ंत कहानी" जैसे और कोई देवता तो मनुष्यों के मन द्वारा गढ़े हुए हैं ही नहीं!


पर अब मैं खुद भी सोच रही हूं, कौन है राधा? क्योंकि महाभारत और उसके समकालीन ग्रंथों में हमें किसी राधा का ज़िक्र नहीं मिलता।


अगर एक समाजशास्त्रीय परिपेक्ष से देखें तो जिस काल में राधा लोकप्रिय हुईं, वह काल कर्मकांड और ऐश्वर्य से भक्ति, संतोष और ईश्वर से निष्काम प्रेम की ओर बढ़ रहा था। सुना है श्रीमद् भागवतम् में गोपियों का ज़िक्र है, शायद समय की यह मांग रही हो कि समाज में कृष्ण के प्रति उमड़ रहे प्रेम को एक नए भाव में अनुभव किया जाए—माधुर्य भाव में—एक प्रेमी के भाव में, और यह माधुर्य रस एक राधा नामक पात्र में भर दिया गया हो। कुछ कहानियों में राधा एक वैवाहिक स्त्री है जो रात्रि के प्रहर में कृष्ण से मिलने जाती है; यह मान्यता बंगाल में ज्यादा प्रचलित है। तो कुछ कथाएं मानती हैं कि राधा का जिस अयान से विवाह हुआ था वह अयान के रूप में कृष्ण ही थे, तो कुछ मानते हैं कि भांडीर वन में राधा-कृष्ण का विवाह बाल्यावस्था में ही हो चुका था।


मुझे हंसी आती है और तरस आता है बेचारी राधा और उसके प्रेम पर, जिसे लोग सर्वश्रेष्ठ तो बताते हैं, पूजनीय भी मानते हैं, लेकिन बिना विवाह के ठप्पे के स्वीकार नहीं कर पाते।


लेकिन मैं कोई समाजशास्त्री तो हूं नहीं, बस एक बीस वर्षीय कन्या हूं जिसका कलम उसकी भावनाओं की स्याही से चलता है। तो कभी-कभी मन में ख्याल आता है शायद 12वीं शताब्दी आते-आते वैकुंठ में बैठे नारायण या गोलोक में बैठे गोविंद के मन में अपनी उस वृंदावन की विस्मृति सखी को लेकर एक टीस उठी होगी। कि हर कोई मां यशोदा, नंद बाबा, बलराम भैया, मधु-मंगल, श्रीदामा, और सुदामा को तो जानता है लेकिन उस भोली-भाली चंचला, बरसाने की जान, उनकी प्रियतम सखी जिसे वह अपना दर्पण मानते हैं,‌ उसे कोई नहीं जानता। तो हो सकता है हरि कृपा से कोई कवि वृन्दावनेश्वरी का दृष्टा बन गया हो। अखिरकार किसी-न-किसी शताब्दी में किसी-न-किसी अंगिरागोत्रीय ऋषि ने भी इंद्र देव को पहली बार देखा ही होगा। मैं नहीं मानती कि किसी देवी-देवता का पहले या बाद में लोकप्रिय होना उनकी धार्मिक सत्ता पर प्रभाव डालता है, मायने सिर्फ़ ये रखता है कि एक समय पर मनुष्य भगवत् तत्व किन गुणों में देखता है। अगर देवताओं की पौराणिकता मायने रखती तो हिंदू धर्म के सबसे पूज्य देवता द्यौष पितृ होते, लेकिन मेरे पाठक-गणों में से कितनों ने ये नाम कभी सुना ही होगा? ख़ैर,‌ द्यौष पितृ की बात किसी और दिन करेंगे।


आज भी, मात्र शास्त्रों में मानने वाले विद्वान माता रुकमणी को ही एकमात्र महालक्ष्मी स्वरूपा मानते हैं, जो की उचित है, वे द्वारिका और द्वारिकाधीष की साम्राज्ञी हैं, किंतु राधा को पूज्य उनका कोई अवतार होना नहीं एकमात्र उनका प्रेम बनाता है।


कभी-कभी मन में ख्याल आता है कि कृष्णा यदि राधा से इतना ही प्रेम करते थे तो अचानक से रुक्मणी से इतना प्रेम कैसे कर बैठे? क्या समय ने राधा की स्मृति को धुंधला कर दिया या रुक्मणी एक पत्नी तो थी किंतु "पहला प्रेम" नहीं।


कृष्ण, मैंने तुम्हारी योगस्थ बुद्धि के बारे में सुना है। तुम वही निर्णय लेते हो जो उचित है, भले ही वह तुम्हारे हृदय को क्यों न भेद दे। तो सबसे पहले यह बताओ, कल्लू महाराज, आपमें और श्री राम में क्या अंतर बचा? समाज के भले के लिए खुद को दुख दे लो किंतु अपनी पत्नी सखी या प्रयसी पर अपने सत्कर्मों का बोझ डालना मुझे तुम पर भौंहें तानने को मजबूर करता है।


राजकुमार थे तुम! उसे रथ में अपने साथ राधा को भी तो ले जा सकते थे? पर ख़ैर, यह तर्क भी तभी तक चल सकता है जब तक मैं मानूं कि राधा तुम्हारी प्रयसी थी, हो सकता है सबसे प्यारी सखी रही हो? हो सकता है कि तुम्हारा उसके ड़े फोड़ देना, चुटिया खींचना, रंग लगाना, साथ नृत्य करना, एक ऐसा प्रेम हो जो मित्रता और आकर्षण के कहीं बीच आता हो। तुम थे भी तो ग्यारह या चौदह साल के जब तुम्हें मथुरा बुला लिया गया! तो शायद राधा तुम्हारी "क्या" लगती थी इससे तुम्हें कोई अंतर पड़ा ही नहीं। राधा थी, और प्यारी थी। और इतना बहुत था। शायद समाज आज भी वैसा ही है जैसा उसे समय था, जिसने तुम्हारी गर्ल-बेस्टी को तुम्हारी गर्लफ्रेंड मान लिया।

1 Comment


Anurag goswami
17 hours ago

Is tarah के व्याख्यान को padh कर मुझे मेरे 20 varshiya vyaktitva ka dhyan aa gaya. Lekin ye yaad kar ke main khush bhi hua ki ab 27 varshiya hone के बाद or gehra hi hua hu toh kuch bigda hi nahi.


Aap ki anya कृतियों ko bhi padhne ke baad ye tippani yahan daal raha hu sakhi.


You go queen. God bless you with more sharpness. Keep doing so this generation really need this kinda shit also.


💐

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